Thursday, April 8, 2010

तुम साथ हो जो अपने...


अकेले थे तो मंजिल नज़र नहीं आती थी,
फासलें मीलों लम्बे हो गये थे,
राह सुनी थी दूर तलक,
खामोश थी जमीं, चुप सा था फ़लक,
तुम जो हमराही बन कर आये तो,
गुनगुनाने लगे है ये जमीं आसमां,
राहें अब आबाद नज़र आती हैं,
मीलों के फासलें भी पल में तै हो जाते हैं,
अब तो लगता है की मानों मंजिल,
खुद चल कर हम तलक आएगी,
और कहेगी .. जो इतना प्यारा हमसफ़र है,
तेरा दोस्त ..... तो क़यामत भी तुम्हारा
क्या बिगाड़ पाएगी ?

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