Thursday, April 8, 2010

अब जान गयी की कौन हो तुम.....


हे पथिक कौन हो तुम, जो मेरे जीवन के मर्रुस्थल में,
एक चोर बादल की तरह घुस आये हो,
बारिश की बूँद बनकर क्यूँ तुमने मेरे तप्त हृदय को
शीतल कर दिया है ।
इस तरह अनाधिकार मेरे मन प्रांगण में प्रवेश की चेष्ठा क्यूँ की तुमने ?
मैंने तो अपने मन के और जीवन के सभी द्वारों पर ताले लगाये थे,
फिर तुम कहाँ से अन्दर आ गये ?
मै भी तुम्हारा परिचय जानना चाहती हूँ ।
सच बताऊं तो तुम्हारा यूँ दबे पांव चुपके से
आना न जाने क्यूँ मुझे अच्छा लग रहा है ।
लग रहा है मानो टूट कर गिरने से पहले ही
तुमने मुझे सम्हाल लिया है, और तुम्हारे साथ
मै संसार के हर संकट से सुरक्षित हूँ ।
ठहरो ...एक झण को लगा की मै तुम्हे जानती हूँ ,
सदियों से नहीं शायद जन्म जन्मान्तरों से
हाँ ... मैंने तुम्हे पहचान लिया है।
तुम्ही तो हो मेरा परिचय, मेरा अस्तित्व, मेरी संपूर्णता
तुम मुझमे हो और मै तुम में,
मै जान गयी हूँ की तुम मेरा जीवन हों ....

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